राजा दाहिर सेन
राजा दाहिर आठवीं सदी ईस्वी में सिंध के शासक थे. वो राजा चच के सबसे छोटे बेटे और ब्राह्मण वंश के आख़िरी शासक थे.
सिंधियाना इंसाइक्लोपीडिया के मुताबिक़ हज़ारों वर्ष पहले कई कश्मीरी ब्राह्मण वंश सिंध आकर आबाद हुए, ये पढ़ा-लिखा तबक़ा था, राजनीतिक असर और रसूख़ हासिल करने के बाद उन्होंने राय घराने की 184 साल की हुकूमत का ख़ात्मा किया और चच पहले ब्राह्मण बादशाह बने.
इतिहासकारों के मुताबिक़ राजा दाहिर की हुकूमत पश्चिम में मकरान तक, दक्षिण में अरब सागर और गुजरात तक, पूर्व में मौजूदा मालवा के केंद्र और राजपूताने तक और उत्तर में मुल्तान से गुज़रकर दक्षिणी पंजाब तक फैली हुई थी. सिंध से ज़मीनी और समुद्री व्यापार भी होता था.
ये दुर्भाग्यपूर्ण है कि इतिहास के पन्नों में राजा दाहिर सेन को वो स्थान नहीं मिला जिसके वो अधिकारी थे. किन्तु भारतवर्ष की सातवीं और आठवीं सदी साक्षी है इस प्रतापी राजा की जिन्होंने 679 ईस्वी में जब सिंध की राजसत्ता संभाली तो उनके सामने चुनौतियों का अंबार था. किन्तु सत्ता संभालने के बाद अपनी सूझबूझ और दूरदर्शिता से राजा दाहिर सेन ने इन चुनौतियों का सामना किया और इससे पार पाने में सफल रहे.
उन्होंने अरब आक्रांताओं का डटकर सामना किया और उन्हें घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया.
न्याय प्रिय राजा
‘तारीख़-ए-सिंध’ में मुमताज़ पठान लिखते हैं कि राजा दाहिर न्याय प्रिय थे. उनके समय में तीन तरह की अदालतें थीं, जिन्हें कोलास, सरपनास और गनास कहा जाता था, बड़े मुक़दमे राजा के पास जाते थे जो सुप्रीम कोर्ट का दर्जा रखते थे.
मुहम्मद बिन कासिम का भारत पर हमला और राजा दाहिर
आठवीं सदी में बग़दाद के गवर्नर हुज्जाज बिन यूसुफ़ के आदेश पर उनके भतीजे और नौजवान सिपहसालार मोहम्मद बिन क़ासिम ने सिंध पर हमला किया । मुहम्मद बिन क़ासिम के भारतीय अभियान को हज्जाज कूफ़ा के शहर में बैठा नियंत्रित कर रहा था। ७१० ईसवी में ईरान के शिराज़ शहर से ६,००० सीरियाई सैनिकों, ६०० ऊंटों की सेना तथा ३००० सामान ढोने वाले ऊंट थे और अन्य दस्तों को लेकर मुहम्मद बिन क़ासिम पूर्व की ओर निकला। मकरान में वहाँ के राज्यपाल ने उसे और सैनिक दिए। उस समय मकरान पर अरबों का राज नया था और उसे पूर्व जाते हुए फ़न्नाज़बूर और अरमान बेला (आधुनिक ‘लस बेला’) में विद्रोहों को भी कुचलना पड़ा। फिर वे किश्तियों से सिंध के आधुनिक कराची शहर के पास स्थित देबल की बंदरगाह पर पहुंचे, जो उस ज़माने में सिंध की सबसे महत्वपूर्ण बंदरगाह थी।
देबल से अरब फ़ौजें पूर्व की ओर निकलती गई और रास्ते में नेरून और सहवान जैसे शहरों को कुचलती गई। यहाँ उन्होंने बहुत बंदी बनाए और उन्हें गुलाम बनाकर भारी संख्या में हज्जाज और खलीफा को भेजा। बहुत सा ख़ज़ाना भी भेजा गया और कुछ सैनिकों में बाँटा गया। बातचीत करके अरबों ने कुछ स्थानीय लोगों को भी अपने साथ मिला लिया। सिन्धु नदी के पार रोहड़ी में दाहिर सेन की सेनाएँ थीं जो हराई गई। दाहिर सेन की मृत्यु हो गई और मुहम्मद बिन क़ासिम का सिंध पर क़ब्ज़ा हो गया। दाहिर सेन के सगे-सम्बन्धियों को दास बनाकर हज्जाज के पास भेज दिया गया। ब्राह्मनाबाद और मुल्तान पर भी अरबी क़ब्ज़ा हो गया।
राजा दाहिर की बेटियां और मोहम्मद बिन क़ासिम
‘चचनामा’ में इतिहासकार लिखता है कि राजा दाहिर की दो बेटियों को खलीफा के पास भेज दिया गया । खलीफा बिन अब्दुल मालिक ने दोनों बेटियों को एक दो रोज़ आराम करने के बाद उनके हरम में लाने का आदेश दिया.
एक रात दोनों को खलीफा के हरम में बुलाया गया । खलीफा ने अपने एक अधिकारी से कहा कि वो मालूम करके बताएं कि दोनों में कौन सी बेटी बड़ी है ।
बड़ी ने अपना नाम सूर्या देवी बताया और उसने चेहरे से जैसे ही नक़ाब हटाया तो खलीफा उनकी ख़ूबसूरती देखकर दंग रह गए और लड़की को हाथ से अपनी तरफ़ खींचा लेकिन लड़की ने ख़ुद को छुड़ाते हुए कहा, “बादशाह सलामत रहें, मैं बादशाह की क़ाबिल नहीं क्योंकि मोहम्मद बिन क़ासिम ने हमें तीन रोज़ अपने पास रखा और उसके बाद खलीफा की ख़िदमत में भेजा है । शायद आपका दस्तूर कुछ ऐसा है, बादशाहों के लिए ये बदनामी जायज़ नहीं । “
इतिहासकार के मुताबिक़ खलीफा वलीद बिन अब्दुल मालिक, मोहम्मद बिन क़ासिम से बहुत नाराज़ हुए और आदेश जारी किया कि वो संदूक़ में बंद होकर हाज़िर हों । जब ये फ़रमान मोहम्मद बिन क़ासिम को पहुंचा तो वो अवधपुर में थे । तुंरत आदेश का पालन किया गया लेकिन दो रोज़ में ही उनका दम निकल गया और उन्हें दरबार पहुंचा दिया गया. कुछ इतिहासकारों का मानना है कि राजा दाहिर की बेटियों ने इस तरह अपना बदला लिया ।